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Civilisation

The Most Productive Parliament Session

7 अगस्त को नई सरकार का बजट सत्र खत्म हुआ। इस पूरे सत्र में संसद के दोनों सदनों ने 35 दिन काम किया। राज्यसभा और लोकसभा दोनों ने कुल मिलाकर 26 विधेयक ( bill) पास किए। जिसका मतलब 1.36 विधेयक पास किए गए। लोग इस बात पर छाती ठोककर, गर्व से बढ़ चढ़कर बता रहे है कि यह संसद का सबसे productive सत्र था जहां सबसे ज्यादा विधेयक पास किए गए। जी, बिल्कुल सबसे ज्यादा productive सत्र होगा पर इसका मतलब यह भी है कि इन सब विधेयकों पर चर्चा नहीं हुई। जिसके लिए संसद का निर्माण हुआ है वही नहीं हुआ।इन विधेयकों में UAPA, NIA Amendment, RTI Amendment, reorganization of Jammu and Kashmir  जैसे विधेयकों का समावेश होता है।

इस सभी विधेयकों में सामान्य बात यह है कि इन पर संसद में चर्चा ही नहीं हुई और अगर हुई तो बहुत कम हुई। चर्चा से मेरा मतलब सही मायने में चर्चा है। चीखना,चिल्लाना,walk out या मार पीट नहीं। जैसे कि NIA( National investigation agency) amendment bill के मुताबिक अब NIA किसी के भी घर में घुस सकती है, तहकीकात कर सकते है। क्या यह ताकत देना ज़रूरी था जहां NIA किसीभी राज्य सरकार से बात किए बिना राज्य में किसी के भी घर में घुस जाए ? क्या यह हमारे संविधान में बताए गए संघवाद( federalism) के ढांचे के मुताबिक ठीक है? यह सब सवाल संसद से गायब रहे, चर्चा नहीं हुई। उस विधेयक में भी त्रुटियां, गलतियां हो सकती है और जब चर्चा होती है तो यही त्रुटियां हटाई जाती है, जिन लोगों को नजर अंदाज़ किया गया है उनका समावेश हो सके। मतलब चर्चा से एक त्रुटिपूर्ण विधेयक त्रुटि रहित हो सकता है। 

ऐसा ही कुछ हुआ Reorganization of Jammu and Kashmir bill और अनुच्छेद 370 के साथ। हम सब ने अब तक देख ही लिया होगा कि किस तरह से यह विधेयक पास किया गया। कितनी जल्दी, कोलाहल में पास किया गया जब की यह संवैधानिक मामला था। और उसके अलावा कश्मीर कितना अहम मुद्दा है यह हमे पता ही है। तो क्या यह ज़रूरी नहीं था कि इस विधेयक पर ज्यादा चर्चा हो? और इसके साथ संविधान में बदलाव आए । यह निर्णय 1.25 करोड़ कश्मीरियों की जिंदगी को प्रभावित करता है तो क्या चर्चा ज़रूरी नहीं थी? यह गौर कीजिए कि अभी हम सब इस पर चर्चा कर रहे हैं पान की दुकान पर, चाय की दुकान पर, स्कूल में हर जगह पर जहा चर्चा होनी चाहिए थी वहां हुई ही नहीं। और इस निर्णय से संविधान में बदलाव आया है। संविधान जो सबसे अहम चीज़ों में से एक है किसी भी लोकतंत्र के लिए, उसमे बदलाव लया गया तुरंत, बिना किसी चर्चा के, यह मान लिया गया कुछ लोगो द्वारा की यह सब सही हो रहा है,    संविधान में बदलाव से पहले चर्चा करना ज़रूरी नहीं? क्यूं की इस घटना से आने वाली सरकारें ज़रूर सीख ले सकती है कि किस तरह से बिना चर्चा के, जब मन हो तब, ख़ुद को सही मान कर, मन मुताबिक संविधान में बदलाव लाया जा सकता है।

~ Dhrupad Mehta

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