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Civilisation

Cultural Contradiction

Read the following article about the cultural contraction in BOTH HINDI AND ENGLISH. Scroll down for English

Legislation can’t be a remedy for prejudice.

विधान या कानून बना देने से हमारे पूर्वाग्रह ख़त्म नहीं हो सकते। यह हमारे देश के लिए काफ़ी योग्य है। हमारे देश में बहुत सारे कानून है, हमारे पास संविधान है जो लोगों की भलाई के लिए बना है। और यह हमारा फ़र्ज़ है कि हम हमारे संविधान को अपनाए और उसका अमल करें।पर सिर्फ कानून और संविधान से हमारे पूर्वाग्रह ख़त्म नहीं होते। हमारे पूर्वाग्रह, हमारे कुछ रीति रिवाज उन सभी कानून, हमारे संविधान के खिलाफ़ काम करते है। मतलब की हमारा संविधान जो इस देश को राह दिखाता है जिस पर हमें चलना चाहिए वह संविधान हमें कुछ कहता है और हम कुछ और ही करते हैं।

आप सोच रहे होंगे कि इसका मतलब क्या हुआ? तो चलो एक ऐसे ही विरोधाभास का उदाहरण लेते हैं।

हमारे संविधान का अनुच्छेद १७ अस्पृश्यता को प्रतिबंधित करता है। यानि की आप पिछड़ी जाति के किसी भी इंसान को धार्मिक स्थल या मनोरंजन की जगह या किसी भी जगहों पर जाने से नहीं रोक सकते। वह प्रथा जो सालों से चली आ रही थी कि ऊंची जाति के लोग पिछड़ों को छू नहीं सकते या अगर पिछड़ी जाति के लोगों ने गलती से छू लिया तो उन को मारा जाता, पिटा जाता। तो संविधान के अनुच्छेद 17 के अनुसार अब यह सब कुछ प्रतिबंधित है और अगर कोई करता है तो यह गुनाह है। क्यूं की हम एक लोकतांत्रिक देश है और हमारे संविधान के नज़रों में इस देश का हर नागरिक सामान है।  यह अस्पृश्यता की प्रथा सदियों से चली आ रही है और इसको प्रतिबंधित करके  संविधान ने अपना काम कर दिया है पर क्या हमने उसका अमल किया है?

उदाहरण के तौर पर पिछले साल मेरे पापा का देहांत हुआ तब क्रियाकर्म करते वक्त एक रिवाज़ करना था जिसमें मुझे एक दलित को बुला के कुछ चीजें देनी थी, तो उसके लिए हमारे घर के आसपास जो रास्ते साफ़ करती हैं उस महिला को बुलाया गया उन्हें मैने कुछ चीजें दी। पर चीजें मुझ उस  देनी थी के मैं कहीं उनको छू न लूं । और  उसके बाद वे चली गई और मुझे कहा गया कि मुझे वो रास्ते पर पानी डालना है, उस रास्ते को पवित्र करना है जिस रास्ते से  वे आई थीं। और यह अस्पृश्यता ही थी। जब मैं यह सब कर रहा था तब मुझे बहुत ज्यादा गुस्सा आ रहा था पर उस वक्त मैं कुछ कर न सका। पर उस दिन मुझे यह बात समझ में आई कि संविधान और हम जो जिते हैं उस जीवन में कितना विरोधभास है। संविधान का हमें अनुसरण करना चाहिए पर हमारे पूर्वाग्रह, रीति रिवाज करने नहीं देते।

यह कितना क्रूर और दर्दनाक है एक इंसान को वह जो काम करता है , उसकी जो जाति है उसके लिए अपमानित करना।उस हद तक गिर जाना की हमें उनके कदम गंदे लगत्ते है और रास्ता साफ़ करने लगते हैं।

कितना विरोधाभास है हमारे संविधान और हमारे जीवन के बीच और हर चुनाव के वक्त हम खुद को सबसे बड़ा लोकतंत्र बताते हैं और एकदुसरे को नसीहत देते हैं कि हमें संविधान का अमल करना चाहिए। पर क्या हम सच में अमल करते हैं? और यह विरोधाभास जीवन के हर पहलू में है। हमारी सोच में, हमारे पारिवारिक, राजनैतिक, सामाजिक जीवन में न्यायतांत्र में हर जगह। और जैसे मैने पहले ही कहा “Legislation can’t be a remedy for prejudice”.

तो खुद से सवाल कीजिए, अपने धर्म से, अपने संप्रदाय से, अपने राजनेता से, अपने परिवार से उस हर एक चीज़ से सवाल कीजिए जो पूर्वाग्रह बनाती है, जो हमे संविधान का अनुसरण करने से रोकती हैं, अमल करने से रोकती हैं क्यूंकि संविधान का अनुसरण करना हमारा फ़र्ज़ है और हमारी देशभक्ति है और मुझे लगता है आज के दौर में हर इंसान देशभक्त है।


Legislation cannot be a remedy for prejudice.

By making legislations or law we cannot end our biases. This statement is pretty appropriate for our country. We have so many laws, we have our Constitution which has been made for the betterment of people.It is our duty that we adopt our Constitution and execute it properly. But law and Constitution cannot solely end our biases. Some of our biases, some of our customs and rituals work against the law and our Constitution. This means that the Constitution which is supposed to guides us on the path we should tread tells us something else and we make a different meaning out of it and do something else.

You might be still confused? Let us take an example of a similar paradox.

Article 17 prohibits untouchability. It means that you cannot stop someone of the lower caste from going to a religious, entertainment or any other place. This practice had been going on for years where the people of the upper castes were not allowed to touch the people of the lower castes and if the people of the lower castes by mistake touch someone of the upper castes, then they would (the ones of lower castes) get beaten up and be humiliated. So, according to Article 17 of the Constitution, all of this is banned and if someone does this, it would be considered a crime because we are a democratic nation and every citizen is equal in the eyes of the Constitution. This practice of untouchability is being carried out since so many years and to stop this, Constitution has done its work but the question is, have we implied/executed that?

For example, last year when my father passed away, we were supposed to carry out a ritual in which I was supposed to give certain things to a lower caste person (a Dalit). For that, a lady who cleans the roads around my house was called and I gave her those ritualistic certain things. But I was asked to give her those in such a way that I don’t touch her by mistake. After the whole process was over, I was asked to sprinkle water on the road she had passed in order to purify the road. And is a classic example of untouchability. While I was doing all these rituals, I was so angry and more than that, I was helpless. I couldn’t do anything. On that day I realized the paradox that exists between our Constitution and the way we live. We should follow our Constitution but our biases, our customs, and our rituals do not allow us to do that.

How cruel and painful it is that a person is humiliated because of the work that they do and their caste. We fall down to such an extent where the path that they walk on seems impure to us and we end up trying to make that pure.

How big the paradox is between our Constitution and our life and yet during every election, we call ourself the biggest democracy and give edification that we should implement our Constitution. But do we really implement it? And this paradox exists in every aspect of our lives. This paradox is present in our thoughts, in our personal, political and social lives and in our judiciary system as well. Like I mentioned in the beginning, ‘Legislation cannot be a remedy for prejudice’.

Ask yourself, ask your religion, ask your sect, ask your political leader, ask your family and ask everyone that creates a bias, that stops us from following our Constitution and stops us from implementing our Constitution. Because following our Constitution is our duty, an act of patriotism and I think each and every one of us in our nation can be a true patriot.

Dhrupad Mehta

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